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पिता की कंपनी में की छोटी सी नौकरी, सिर्फ ₹1743 थी सैलरी, आज ₹2000 करोड़ की कंपनी संभाल रही हैं पूजा

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अक्सर यह माना जाता है कि बड़े बिजनेस घरानों के बच्चों को ऊंची कुर्सियां विरासत में और बिना किसी संघर्ष के मिल जाती हैं. लेकिन भारत के सबसे बड़े राइटिंग इंस्ट्रूमेंट और स्टेशनरी कंपनी लक्सर (Luxor) की कमान संभाल रही पूजा जैन गुप्ता की कहानी इस धारणा को पूरी तरह से खारिज करती है. पूजा ने अपनी व्‍यावसायकि यात्रा कंपनी के शीर्ष से नहीं, बल्कि सबसे निचले पायदान से शुरू की थी. आज वह ₹2,000 करोड़ से अधिक की वैल्यू वाले विशाल लक्सर ग्रुप की मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. लेकिन एक समय ऐसा भी था जब उनके पिता की ही कंपनी में वे एक साधारण कर्मचारी की तरह काम करती थी और उन्‍हें सिर्फ ₹1,743 वेतन मिलता था.
लक्सर ग्रुप की नींव पूजा जैन गुप्ता के पिता दिवंगत डीके जैन ने साल 1963 में मात्र ₹5,000 से रखी थी. डीके जैन ने काम के प्रति अटूट समर्पण और जबरदस्त जुनून के दम पर इसे एक बड़ी कंपनी बनाया. पूजा को अपने पिता की कंपनी में काम करने की प्रेरणा जापान के एक टूर से मिली. वह अपने पिता के साथ जापान में आयोजित होने वाले एक ‘इंटरनेशनल स्टेशनरी इंडस्ट्री फेयर’ में चली गईं. असल में यह कोई बिजनेस ट्रिप नहीं थी, बल्कि पूजा सिर्फ जापान घूमना चाहती थीं. वहां मेले में जाने के बाद उन्‍हें अहसास हुआ कि उनके पिता ने वैश्विक स्तर पर कितनी बड़ी पहचान बनाई है. इससे पूजा बहुत प्रभावित हुई और उन्‍होंने फैसला किया कि उन्हें अपने पिता के साथ ही काम करना है.

जब पूजा ने बिजनेस में शामिल होने की इच्छा जताई तो डीके जैन ने एक सख्त भारतीय पिता की तरह व्यवहार किया. उन्होंने साफ कर दिया कि कंपनी के संस्थापक की बेटी होने का मतलब यह नहीं है कि सब कुछ थाली में परोसा हुआ मिल जाएगा. उन्होंने पूजा को कॉलेज के साथ-साथ आधे दिन के लिए एक ट्रेनी (Trainee) के रूप में लक्‍सर में काम पर लगा दिया. डीके जैन के चार बच्चों में से केवल पूजा ने इस पारिवारिक व्यवसाय में रुचि दिखाई थी. उन्‍होंने पूजा के लिए सफलता की राह को जानबूझकर कठिन बनाया ताकि वह जमीन से सीख सकें. पूजा को शुरुआत में सिर्फ ₹1,743 प्रति माह की सैलरी पर रखा गया.
पूजा को कंपनी के अलग-अलग विभागों में तीन-तीन और छह-छह महीनों के लिए रोटेट किया गया. उन्होंने सेल्स, मार्केटिंग, प्रोडक्शन और इंपोर्ट डिपार्टमेंट में काम किया. सबसे खास बात यह थी कि ऑफिस में उन्हें किसी मालिक की बेटी की तरह नहीं, बल्कि एक सामान्य कर्मचारी की तरह देखा जाता था और वह अपने पिता की बजाय विभाग के प्रोफेशनल हेड्स को ही रिपोर्ट करती थीं. पूजा का कहना है कि उन्‍होंने जमीनी स्तर से बहुत कुछ सीखा. ब्रिटेन (UK) में एक रिटेल स्टोर पर काउंटर पर खड़े होकर ग्राहकों को सामान बेचने तक का काम भी किया है.


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